हरियाणा की लोक संस्कृति बचाने में जुटा SUPVA, सांग को दे रहा नई पहचान

Published On: June 8, 2026
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रोहतक: तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण और आधुनिक मनोरंजन के दौर में हरियाणा की लोक संस्कृति और पारंपरिक कला रूपों को बचाए रखने की चुनौती लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में दादा लख्मी चंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (SUPVA) हरियाणा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

लोककवि, संगीतकार और सूर्यकवि दादा लख्मी चंद के नाम पर स्थापित यह विश्वविद्यालय न केवल हरियाणा की पारंपरिक लोकनाट्य शैली ‘सांग’ को जीवित रखने का प्रयास कर रहा है, बल्कि रंगमंच कलाकारों को प्रोत्साहन देने और राज्य के उभरते फिल्म उद्योग को भी नई दिशा दे रहा है।

‘सांग समागम’ बना संस्कृति संरक्षण का बड़ा मंच

विश्वविद्यालय की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक जनवरी में आयोजित पहला ‘सांग समागम’ रहा। इस आयोजन का उद्देश्य हरियाणा की प्रतिष्ठित लोकनाट्य परंपरा सांग को पुनर्जीवित करना था।

सांग हरियाणा की पारंपरिक लोककला है, जिसमें गीत, संगीत, संवाद और अभिनय के माध्यम से पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कथाएं प्रस्तुत की जाती हैं। इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में यह कला धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच रही है।

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विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अमित आर्य ने बताया कि इस कार्यक्रम में हरियाणा के प्रसिद्ध सांग कलाकारों ने शानदार प्रस्तुतियां दीं।

  • पंडित विष्णु दत्त और उनकी टीम ने ‘किस्सा छाप सिंह’ का मंचन किया।
  • डॉ. सतीश जॉर्ज कश्यप ने ‘संगत कबीर’ की प्रस्तुति दी।
  • प्रदीप राय ने ‘लीलो चमन’ का भावनात्मक मंचन कर दर्शकों की सराहना बटोरी।

इस कार्यक्रम में हरियाणा के शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

लोक कलाकारों को मिला सम्मान

कार्यक्रम के दौरान हरियाणा की लोक परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले महान कलाकारों के परिवारों और सहयोगियों को भी सम्मानित किया गया। इनमें दादा लख्मी चंद, मेहर सिंह, राय धनपत सिंह, पंडित मांगे राम और बाजे भगत जैसी हस्तियां शामिल हैं।

40 से अधिक थिएटर समूहों को सम्मान

बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से आयोजित ‘भरंगम-सरंग महोत्सव’ में देशभर की विभिन्न रंगमंच और संगीत परंपराओं को मंच मिला।

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कुलपति ने बताया कि इस अवसर पर हरियाणा के रंगमंच आंदोलन को जीवित रखने वाले 40 से अधिक थिएटर समूहों और सांस्कृतिक संगठनों को सम्मानित किया गया।

बॉलीवुड और वेब सीरीज में छा रहे SUPVA के छात्र

विश्वविद्यालय की रजिस्ट्रार डॉ. गुंजन मलिक मनोचा ने बताया कि SUPVA के छात्र अब बॉलीवुड, क्षेत्रीय सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी पहचान बना रहे हैं।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अभिनेता, निर्देशक, सिनेमैटोग्राफर, एडिटर, संगीतकार और ऑडियोग्राफर के रूप में सफलता हासिल कर रहे हैं।

हरियाणवी कलाकार मासूम शर्मा अभिनीत फिल्म License में लगभग 90 प्रतिशत क्रू SUPVA के पूर्व छात्रों का था। वहीं Doojvar-2 के निर्देशक और मुख्य कलाकार भी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।

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ब्रिटेन तक पहुंची हरियाणवी संस्कृति

विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र शंकर शरण आज ब्रिटेन में रहते हुए थिएटर और अभिनय के माध्यम से हरियाणवी एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उन्हें ‘जश्न-ए-आजादी’ नाटक में शहीद मदन लाल ढींगरा की भूमिका के लिए विशेष पहचान मिली।

संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन

कुलपति डॉ. अमित आर्य का कहना है कि आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ युवाओं का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक कला रूपों का संरक्षण और उनके प्रति जागरूकता बढ़ाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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