चंडीगढ़: महेंद्रगढ़ और आसपास के जिलों में कपास की खेती करने वाले अधिकांश किसान अब तेजी से बाजरा (pearl millet) की ओर रुख कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण लगातार बढ़ता कीट प्रकोप, अनियमित मौसम और बढ़ती लागत बताया जा रहा है।
कपास खेती में भारी गिरावट
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कपास की खेती पिछले सात वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। इस साल राज्य में कपास का रकबा घटकर लगभग 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो करीब 70% की गिरावट को दर्शाता है।
किसानों का कहना है कि पिंक बॉलवर्म (pink bollworm) नामक खतरनाक कीट ने बीटी कपास की प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित किया है, जिससे फसल बार-बार नष्ट हो रही है और खेती घाटे का सौदा बन गई है।
इसके अलावा:
- कीटनाशकों पर भारी खर्च
- अनियमित और अत्यधिक बारिश
- कम उपज और बढ़ती लागत
ने कपास खेती को और जोखिमपूर्ण बना दिया है।
किसानों का बाजरा की ओर झुकाव
दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़, झज्जर, भिवानी और चरखी दादरी जैसे जिलों में किसान अब बाजरा और ग्वार जैसी कम लागत वाली फसलों को अपना रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- बाजरा सूखा-प्रतिरोधी फसल है
- इसे कम पानी और कम निवेश की जरूरत होती है
- रेतीली मिट्टी और गर्म जलवायु में यह बेहतर उत्पादन देता है
सरकारी योजनाओं का असर
किसानों के इस बदलाव में सरकारी योजनाओं ने भी भूमिका निभाई है:
- बेहतर MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य)
- भावांतर भरपाई योजना का लाभ
- अटल भूजल योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा
- बाजरा प्रोसेसिंग यूनिट्स पर 7% ब्याज सब्सिडी
इन नीतियों से बाजरा अब केवल एक पारंपरिक फसल नहीं, बल्कि एक नकदी फसल (cash crop) के रूप में उभर रहा है।
नतीजा
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में हरियाणा के दक्षिणी जिलों में कपास की तुलना में बाजरा की खेती और अधिक बढ़ सकती है, क्योंकि यह कम लागत, कम जोखिम और बेहतर सरकारी समर्थन वाली फसल साबित हो रही है।









