बिजली निगम प्रभावशाली कंपनियों को बिना एक भी यूनिट बिजली लिए पैसा दे रहे हैं, लेकिन उपभोक्ताओं के हितों की कर रहे हैं अनदेखी: प्रो. सम्पत सिंह

Published On: August 7, 2026
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जब एफएसए की राशि उपभोक्ताओं को वापस करनी थी, तब निगमों ने कोई याचिका दाखिल नहीं की, लेकिन जैसे ही वसूली उनके पक्ष में हुई उन्होंने तुरंत दो याचिकाएं दायर कर दी

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग एक स्वतंत्र नियामक संस्था के रूप में कानून के अनुसार निर्णय देगा, या फिर सरकार और बिजली निगमों के दबाव में काम करेगा?

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चंडीगढ़, 7 अगस्त। इंडियन नेशनल लोकदल के राष्ट्रीय संरक्षक एवं पूर्व मंत्री प्रो. सम्पत सिंह ने शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित पार्टी मुख्यालय पर प्रेस वार्ता कर बताया कि हरियाणा के बिजली वितरण निगम प्रदेश की जनता को लूट रहे हैं। ये निगम, उपभोक्ताओं को बेहतर बिजली सेवा देने के बजाय उन्हें अपनी वित्तीय गलतियों, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की कीमत चुकाने का माध्यम बना रहे हैं। बिजली निगमों ने विद्युत नियामक आयोग (एचईआरसी) से मल्टी ईयर टैरिफ 2024 में नियमों में राहत देने का अनुरोध किया। उन्होंने मांग की है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्रति यूनिट 47 पैसे का मासिक एफएसए वसूलने की बजाय 1,134.54 करोड़ रुपये तथा उस पर कैरीइंग कॉस्ट (ब्याज) को आने वाले वर्षों में सभी उपभोक्ताओं से समान प्रति यूनिट दर पर वसूलने की अनुमति दी जाए।


प्रो. सम्पत सिंह ने बताया कि बिजली वितरण निगमों के अनुसार इस समय वे 27,915 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहे हैं और उन पर 27,248 करोड़ रुपये का कर्ज है। इसके बावजूद अक्टूबर 2025 में निगमों ने बिना एक भी यूनिट बिजली लिए सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड (ग्रीनको समूह) को 1,300 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया। इसके तुरंत बाद संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रभावशाली कंपनियों के लिए पैसा उपलब्ध है, लेकिन उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी की जाती है।


बिजली निगमों ने स्वयं स्वीकार किया है कि नवंबर 2025 में मांगी गई 1,134.54 करोड़ रुपये की राशि में से लगभग 950.09 करोड़ रुपये (84 प्रतिशत) सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के कारण उत्पन्न हुई देनदारी है। यह राशि वास्तव में पिछले वित्तीय वर्षों के ट्रांसमिशन शुल्क, विलंब भुगतान अधिभार और अतिरिक्त बिलों से संबंधित है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान में की जा रही वसूली वित्तीय वर्ष 2022-23 से संबंधित है, जबकि नियमों के अनुसार ऐसी राशि अधिकतम दो वर्ष के भीतर वसूल की जानी चाहिए।

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इसके साथ ही बिजली निगमों का दोहरा रवैया भी सामने आया है। जब एफएसए की राशि उपभोक्ताओं को वापस करनी थी, तब उन्होंने कोई याचिका दाखिल नहीं की। लेकिन जैसे ही वसूली उनके पक्ष में हुई, उन्होंने तुरंत दो याचिकाएं दायर कर दीं। इतना ही नहीं, वे अपनी देरी से होने वाली वसूली पर ब्याज भी चाहते हैं, जबकि उपभोक्ताओं का पैसा महीनों तक रोकने पर उन्हें कोई ब्याज देने को तैयार नहीं हैं।

साथ ही, डिस्कॉम विनियम 68.1(3) में निर्धारित उस प्रावधान से भी बचना चाहते हैं, जिसके अनुसार समय पर राशि न वसूलने पर उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। वे इसके लिए नियमों में छूट लेने के प्रावधानों का सहारा ले रहे हैं। जबकि सर्वोच्च न्यायालय और विद्युत अपीलीय अधिकरण पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि इन प्रावधानों का उपयोग नियमों में बदलाव करने या समाप्त हो चुके अधिकारों को दोबारा जीवित करने के लिए नहीं किया जा सकता।


सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2024 और अगस्त 2025 के अपने महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट कहा है कि राज्य विद्युत नियामक आयोग सरकार के अधीन नहीं हैं। सरकार आयोग के न्यायिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। न्यायालय ने आयोगों की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और दक्षता बनाए रखने तथा नियामकीय विफलता और नियामकीय कब्जे से बचने पर भी जोर दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि बिजली एक सार्वजनिक सेवा है और उपभोक्ताओं पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डालना नियामकीय विफलता का संकेत है। अब कानून स्पष्ट है, तथ्य भी स्पष्ट हैं। उम्मीद है कि हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग संविधान, कानून और हरियाणा के 84 लाख बिजली उपभोक्ताओं के हित में निष्पक्ष निर्णय देगा। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग एक स्वतंत्र नियामक संस्था के रूप में कानून के अनुसार निर्णय देगा, या फिर सरकार और बिजली निगमों के दबाव में काम करेगा?

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