बीमारी की वजह से सेना से बाहर हुए जवानों को भी मिलेगी पेंशन

Published On: May 11, 2026
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चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जवानों के हित में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के फैसले के अंतर्गत जो जवान बीमारी की वजह से सेना से बाहर हो गए थे वो भी पेंशन के हकदार हैं। हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर कोई जवान को ड्यूटी के दौरान बढ़ी या गंभीर हुई बीमारी/ दिव्यांगता के कारण नौकरी से मुक्त किया जाता है तो केवल इस आधार पर उसे दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी दिव्यांगता 20% से कम आंकी गई थी।

जवानों के हित में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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हाईकोर्ट की ओर से केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया गया जिसमें सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) द्वारा दिए गए दिव्यांगता पेंशन के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब नौकरी से मुक्त किए जाने का वास्तविक कारण वही बीमारी या दिव्यांगता है, जो नौकरी के दौरान बढ़ी, तो केंद्र सरकार यह नहीं कह सकती है कि संबंधित सैनिक दिव्यांगता पेंशन का पात्र नहीं है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि केंद्र सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि संबंधित सैन्यकर्मी अपनी बीमारी के बावजूद बिना किसी रूकावट के नौकरी जारी रख सकता था।

पेंशन का लाभ दिया जाना अनिवार्य

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ये पूरा मामला एक पूर्व सैनिक से जुड़ा हुआ है। साल 1971 नवंबर में वो जवान भारतीय सेना से जुड़ा था। साल 1992 तक उसने देशहित में सेवा की। ड्यूटी से मुक्त किए जाने के दौरान वो जवान ‘हेपाटो-इन्टेस्टाइनल अमीबायसिस’ बीमारी से पीड़ित बताया गया और मेडिकल आंकलन में उसकी दिव्यांगता 15 से 19% के बीच आंकी गई, जो सामान्य 20% से नीचे थी। इसके आधार पर ही केंद्र सरकार की ओर से दिव्यांगता पेंशन का विरोध किया गया था और कहा गया था कि बीमारी न तो सैन्य सेवा से जुड़ी हुई थी और ना ही उसके कारण बढ़ी थी।

इस मामले पर हाईकोर्ट ने कहा कि कि बीमारी के कारण सैनिक सेवा जारी रखने में सक्षम नहीं था और उसे मेडिकल आधार पर बाहर करना पड़ा तो कानूनन उसे न्यूनतम 20% दिव्यांगता मानते हुए पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने सुखविंदर सिंह मामले के सिद्धांत का हवाला देते हुए दोहराया कि अगर जवान को सेवा से बाहर किए जाने की वजह बनी दिव्यांगता 20% से कम भी आंकी गई हो, तब भी पेंशन के उद्देश्य से उसे न्यूनतम 20% माना जाएगा।

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